विश्वरूपन्योग - श्लोक पद 16
पद 16
हम बहुतो दुनिया मे हुनकर शाश्वत रूप देखैत छी। हम न मध्यमे देखैत छी आ न दुनियामे विश्वेश्वरक।
अनुवाद
.. 11.16। हे ब्रह्माण्डक प्रभु! हम अहाँक अनेक भुजा, पेट, मुँह आ आँखि देखैत छी, जकर चारि दिस अनन्त रूप अछि। ऐ दुनिया! हम अहाँक अन्त, मध्य आ आरम्भ नहि देखैत छी।