ध्यानयोग - श्लोक श्लोक 9

ध्यानयोग

श्लोक 9

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |

साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ||६-९||

अनुवाद

।।6.9।। जो पुरुष सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बान्धवों में तथा धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव वाला है, वह श्रेष्ठ है।।

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