कर्मयोग - श्लोक श्लोक 28

कर्मयोग

श्लोक 28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः |

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||३-२८||

अनुवाद

।।3.28।। परन्तु हे महाबाहो ! गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व)को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि "गुण गुणों में बर्तते हैं" (कर्म में) आसक्त नहीं होता।।

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