कर्मयोग - श्लोक श्लोक 12

कर्मयोग

श्लोक 12

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः |

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ||३-१२||

अनुवाद

।।3.12।। यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।

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