मोक्षसंन्यासयोग - श्लोक श्लोक 45

मोक्षसंन्यासयोग

श्लोक 45

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः |

स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||१८-४५||

अनुवाद

।।5.10।। जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर करता है, वह पुरुष कमल के पत्ते के सदृश पाप से लिप्त नहीं होता।।

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