मोक्षसंन्यासयोग - श्लोक श्लोक 3

मोक्षसंन्यासयोग

श्लोक 3

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः |

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ||१८-३||

अनुवाद

।।18.3।। कुछ मनीषी जन कहते हैं कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं; और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।।

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