श्रद्धात्रयविभागयोग - श्लोक श्लोक 27
श्रद्धात्रयविभागयोग
श्लोक 27
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते |
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ||१७-२७||
अनुवाद
।।17.27।। यज्ञ, तप और दान में दृढ़ स्थिति भी सत् कही जाती है, और उस (परमात्मा) के लिए किया गया कर्म भी सत् ही कहलाता है।।