पुरुषोत्तमयोग - श्लोक श्लोक 17
श्लोक 17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युधाहृतः |
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ||१५-१७||
अनुवाद
।।15.17।। परन्तु उत्तम पुरुष अन्य ही है, जो परमात्मा कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण करने वाला अव्यय ईश्वर है।।