गुणत्रयविभागयोग - श्लोक श्लोक 19

गुणत्रयविभागयोग

श्लोक 19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ||१४-१९||

अनुवाद

।।14.19।। जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

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