कर्मयोग - श्लोक पद 10

कर्मयोग

पद 10

सहयजनः प्रजाः सृष्टि पुरोवाच प्रजापतिः ई प्रस्विष्याद्वमेश वस्त्विष्तकमुदुक।। 3-10। दिस लऽ जाइत अछि।

अनुवाद

.. 3. 1। प्रजापति (सृष्टिकर्ता) आरम्भमे (सृजनक) एकटा यज्ञक सङ्ग लोकसभक सृजन कयलनि आ कहलनि, "एहि यज्ञसँ अहाँमे वृद्धि होअय आ ई बलिदान अहाँक इच्छित इच्छाक (इस्तकामुदुक) पूर्ति होअय।"

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