मोक्षस्ययोग - श्लोक श्लोक 30

मोक्षस्ययोग

श्लोक 30

वृत्तिमे सेवानिवृत्तिमे एहि क्रियाक आशंका रहैत छैक।

अनुवाद

.. 18.30। ओह प्रिय! जे बुद्धि सहजवृत्ति आ सेवानिवृत्ति, क्रिया आ निष्क्रियता, भय आ निर्भीकता, बन्धन आ मोक्षकेँ जनैत अछि, ओ सात्त्विक अछि।

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