विश्वरूपन्योग - श्लोक श्लोक 37

विश्वरूपन्योग

श्लोक 37

किस्मत ते नामेरानमहत्मान गरियासे ब्राह्मणो-पाडिकार्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमाक्षरम् सदसतपरतपा। 11-37।

अनुवाद

.. 11.37। ओह प्रिय स्वामी! ब्रह्माक आदिम कर्ता आ परम सत्ता अहाँकेँ ओ सभ कोना नमन नहि कऽ सकैत छथि? (कारण) हे अनन्त! ओह यार! ओ प्यारी! अहाँ ओ छी जे एहि दूटा सँ परे अस्तित्वहीन आ अस्तित्वहीन छी।

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