ज्ञानकर्मसन्यासयोग - श्लोक श्लोक 31

ज्ञानकर्मसन्यासयोग

श्लोक 31

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् |

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ||४-३१||

अनुवाद

।।4.31।। हे कुरुश्रेष्ठ ! यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता, फिर परलोक कैसे मिलेगा?

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