सांख्ययोग - श्लोक श्लोक 45
श्लोक 45
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||२-४५||
अनुवाद
।।2.42।।हे पार्थ ! अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुए जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं, इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है। ।।2.43।।कामनाओं से युक्त, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं। ।।2.44।।उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और ऐश्वर्य में आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तःकरण में निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य नहीं होते।