मोक्षसंन्यासयोग - श्लोक श्लोक 67

मोक्षसंन्यासयोग

श्लोक 67

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन |

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ||१८-६७||

अनुवाद

।।18.67।। यह ज्ञान ऐसे पुरुष से नहीं कहना चाहिए, जो अतपस्क (तपरहित) है, और न उसे जो अभक्त है; उसे भी नहीं जो अशुश्रुषु (सेवा में अतत्पर) है और उस पुरुष से भी नहीं कहना चाहिए, जो मुझ (ईश्वर) से असूया करता है, अर्थात् मुझ में दोष देखता है।।

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