क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग - श्लोक श्लोक 27

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

श्लोक 27

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् |

क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ||१३-२७||

अनुवाद

।।13.27।। हे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

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