अर्जुनविषादयोग - श्लोक श्लोक 21, 22, 23

अर्जुनविषादयोग

श्लोक 21, 22, 23

अर्जुन उवाच |

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ||१-२१||

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् |

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ||१-२२||

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः |

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ||१-२३||

अर्जुन उवाच

अनुवाद

।।1.21।।अर्जुन ने कहा -- हे! अच्युत मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये। ।।1.22।।जिससे मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन लोगों का निरीक्षण कर सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किनके साथ युद्ध करना है। ।।1.23।।दुर्बुद्धि धार्तराष्ट्र (दुर्योधन) का युद्ध में प्रिय चाहने वाले जो ये राजा लोग यहाँ एकत्र हुए हैं, उन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा।

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