गीता महात्म्य - श्लोक पद 7

गीता महात्म्य

पद 7

शान्ताकरम भुजगसायनम पद्मनाभम सुरेश विश्वधरम गगनसद्रिशम मेघवर्णा शुभंगम लक्ष्मीकांतम कमलनायनम योगवीर ध्यानगाम्यम वंदे विष्णु च भयहरम सर्वलोकैकनाथ

अनुवाद

हम विष्णुकेँ नमन करैत छी, जे शान्त छथि, सर्पपर विराजमान छथि, जकर नाभिमे कमलक फूल अछि, जे देवताक स्वामी छथि, जे दुनियाक सहारा छथि, जे आकाश जकाँ छथि, जे आकाशक रङ्ग छथि, जकर अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर अछि, जे लक्ष्मीपति छथि, जकर आँखि पद्मनायनक अछि, जे योगीक ध्यानसँ प्राप्त होइत छथि, जे समस्त दुनियाक एकमात्र रक्षक छथि, जे भयकेँ दूर करैत छथि।

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