गणना - श्लोक पद 17
गणना
पद 17
अविनाशीकेँ छोड़ि सब किछु अविनाशी अछि।
अनुवाद
.. 2. 17. ओ जानि लिअ जे की अविनाशी अछि, जाहि सँ ई पूरा संसार व्याप्त अछि। एहि अव्ययकेँ कोनो नष्ट नहि कऽ सकैत अछि।
अविनाशीकेँ छोड़ि सब किछु अविनाशी अछि।
.. 2. 17. ओ जानि लिअ जे की अविनाशी अछि, जाहि सँ ई पूरा संसार व्याप्त अछि। एहि अव्ययकेँ कोनो नष्ट नहि कऽ सकैत अछि।
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