ध्यानयोग - श्लोक श्लोक 45

ध्यानयोग

श्लोक 45

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः |

अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ||६-४५||

अनुवाद

।।6.45।। परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी सम्पूर्ण पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों से (शनै: शनै:) सिद्ध होता हुआ, तब परम गति को प्राप्त होता है।।

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