कर्मयोग - श्लोक श्लोक 30

कर्मयोग

श्लोक 30

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा |

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ||३-३०||

अनुवाद

।।3.30।। सम्पूर्ण कर्मों का मुझ में संन्यास करके, आशा और ममता से रहित होकर, संतापरहित हुए तुम युद्ध करो।।

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