सांख्ययोग - श्लोक श्लोक 50

सांख्ययोग

श्लोक 50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||२-५०||

अनुवाद

।।2.49।।इस बुद्धियोग की तुलना में (सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं। इसलिये हे धनंजय ! तुम बुद्धि की शरण लो; फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।

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